11/08/2026
वैदिक मंत्र 1 ( शांति मंत्र)
शांति मंत्र का पाठ मन, शरीर और वातावरण को शांत एवं संतुलित करने के लिए किया जाता है। वैदिक परंपरा में किसी भी शुभ कार्य, अध्ययन, पूजा या ध्यान की शुरुआत और अंत में शांति मंत्र पढ़ने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
मानसिक शांति और एकाग्रता: यह मन के विचारों को शांत करता है, तनाव और व्यग्रता को कम करता है तथा ध्यान व अध्ययन के लिए एकाग्रता बढ़ाता है।
त्रिविध तापों (तीन प्रकार के कष्टों) से मुक्ति: 'ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः' तीन बार कहने का मुख्य उद्देश्य तीनों प्रकार के तापों से शांति पाना है:
आध्यात्मिक: स्वयं के शरीर और मन से जुड़े कष्ट (जैसे बीमारी, तनाव, गुस्सा)।
आधिभौतिक: बाहरी दुनिया या अन्य जीवों द्वारा मिलने वाले कष्ट (जैसे लड़ाई, प्रदूषण, दुर्घटना)।
आधिदैविक: प्राकृतिक आपदाओं या दैवीय शक्तियों से जुड़े कष्ट (जैसे भूकंप, बाढ़, अतिवृष्टि)।
सकारात्मक ऊर्जा का संचार: मंत्र के उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि तरंगें (vibrations) आसपास के वातावरण को शुद्ध करती हैं और नकारात्मकता को दूर करती हैं।
सद्भाव और सामंजस्य: जैसे 'सह नाववतु' मंत्र में प्रार्थना की जाती है कि मिलकर कार्य करने वाले लोगों में कभी द्वेष या मतभेद न हो, यह समाज और संबंधों में प्रेम व सहकारिता बढ़ाता है।
अहंकार का शमन: यह जीव को याद दिलाता है कि वह प्रकृति और ईश्वर के साथ जुड़ा हुआ है, जिससे विनम्रता और आत्म-साक्षात्कार की भावना जागृत होती है।
इसी तारतम्य में शांति मंत्रों की एक श्रृंखला प्रस्तुत कर रही हूँ।
आज का मंत्र
ॐ सह नाववतु तैत्तिरीय उपनिषद का एक प्रसिद्ध शांति मंत्र है, जिसे अध्ययन, शिक्षण या किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले जपा जाता है।
मंत्र (देवनागरी)
ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हिंदी अर्थ
ॐ सह नाववतु: ईश्वर हम दोनों (शिक्षक और शिष्य/साधक) की एक साथ रक्षा करे।
सह नौ भुनक्तु: ईश्वर हम दोनों का एक साथ पालन-पोषण करे।
सह वीर्यं करवावहै: हम दोनों पूरी ऊर्जा और सामर्थ्य के साथ मिलकर कार्य करें।
तेजस्वि नावधीतमस्तु: हमारा अध्ययन और अर्जित ज्ञान तेजस्वी व फलदायी हो।
मा विद्विषावहै: हमारे बीच कभी द्वेष या मतभेद न हो।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः: ॐ, त्रिविध (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) शांति हो।