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दृष्टि बदलें, जीवन बदलें : माता की सवारियों से सीखें सुखी जीवन का रहस्यनीरजा फाउंडेशन, शुभम कॉलोनी, कायड़, अजमेरसचिव श्र...
17/10/2026

दृष्टि बदलें, जीवन बदलें : माता की सवारियों से सीखें सुखी जीवन का रहस्य
नीरजा फाउंडेशन, शुभम कॉलोनी, कायड़, अजमेर
सचिव श्रीमती सीमा पाराशर के हृदय उद्गार
जय माता दी!
देवी माँ की विभिन्न सवारियाँ केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि उन्हें जीवन-मूल्यों से जोड़कर देखने पर आत्ममंथन की प्रेरणा भी देती हैं। प्रश्न यह नहीं कि माता किस वाहन पर विराजमान हैं, बल्कि यह है कि उन प्रतीकों से प्रेरित होकर हम अपने विचारों, स्वभाव और व्यवहार में क्या परिवर्तन लाते हैं।
सिंह हमें साहस, हंस विवेक, बाघ सजगता और कर्मठता, बैल परिश्रम एवं धैर्य, गरुड़ व्यापक दृष्टि, मोर सौंदर्य और सकारात्मकता, उल्लू विवेकपूर्ण जागरूकता, गधा श्रम एवं सहनशीलता और हाथी शक्ति के साथ धैर्य तथा विनम्रता का स्मरण करा सकता है। ये प्रतीकात्मक जीवन-शिक्षाएँ हैं; इनके अर्थ विभिन्न धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग भी हो सकते हैं।
अब विचार कीजिए, इन शिक्षाओं को जीवन में उतारने से क्या परिवर्तन आ सकता है? साहस हमें अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना सिखाता है, विवेक बिना सत्य जाने किसी पर आरोप लगाने से रोकता है, धैर्य पारिवारिक विवादों में संयम बनाए रखने में सहायता करता है और विनम्रता सफलता के बाद भी रिश्तों का सम्मान करना सिखाती है। सकारात्मक सोच कटुता के बीच भी प्रेम बनाए रखने की प्रेरणा देती है, जबकि श्रम और जिम्मेदारी हमें परिवार तथा समाज के विकास में योगदान देना सिखाते हैं।
वास्तविक परिवर्तन तब शुरू होता है, जब हम दूसरों को बदलने की अपेक्षा करने से पहले स्वयं के व्यवहार का आत्ममंथन करते हैं। पति-पत्नी एक-दूसरे को समझें, माता-पिता बच्चों को संस्कारों के साथ समय दें, बच्चे बड़ों के अनुभवों का सम्मान करें, मित्र कठिन समय में साथ निभाएँ और पड़ोसी मतभेदों के बावजूद सद्भाव बनाए रखें। यही वे छोटे-छोटे प्रयास हैं, जो रिश्तों में विश्वास और जीवन में प्रसन्नता बढ़ाते हैं।
आज मनुष्य के पास सुख-सुविधाएँ बढ़ रही हैं, लेकिन अनेक परिवारों में संवाद, धैर्य और आपसी समझ कम होती दिखाई देती है। इसका समाधान केवल दूसरों से अपेक्षा करने में नहीं, बल्कि अपनी सोच और व्यवहार को बेहतर बनाने में है। धार्मिक प्रतीकों के सामने शीश झुकाना श्रद्धा है, लेकिन उनसे प्रेरणा लेकर अपने आचरण को सुधारना आत्मपरिवर्तन है।
आइए, माता से केवल अपने कष्ट दूर करने की प्रार्थना न करें, बल्कि ऐसा विवेक भी माँगें कि हम दूसरों के कष्ट कम कर सकें। हमारी वाणी परिवार में प्रेम बढ़ाए, हमारा व्यवहार बच्चों को अच्छे संस्कार दे, हमारी मित्रता विश्वास जगाए और हमारा सामाजिक जीवन सहयोग एवं सद्भाव का उदाहरण बने।
याद रखें—दृष्टि बदलेगी तो विचार बदलेंगे, विचार बदलेंगे तो व्यवहार बदलेगा और व्यवहार बदलेगा तो जीवन की दिशा भी बदल सकती है। यही माता की शिक्षाओं को जीवन में उतारने का सार्थक मार्ग है।
जय माता दी!
आपके विचार और सुझाव हमारे लिए प्रेरणा हैं। कृपया अपने विचार साझा कर इस सकारात्मक प्रयास को प्रोत्साहित करें।
नीरजा फाउंडेशन
शुभम कॉलोनी, कायड़, अजमेर
सचिव : श्रीमती सीमा पाराशर

*वोटर लिस्ट अपडेट*                                     *_कहीं छूट न जाए आपका नाम_*❗मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (S...
16/10/2026

*वोटर लिस्ट अपडेट*

*_कहीं छूट न जाए आपका नाम_*❗

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SSR) का आदेश दिया है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 12 नवंबर 2026 को मतदाता सूची का मसौदा और 6 जनवरी 2027 को अंतिम सूची प्रकाशित करने का लक्ष्य है।

*SSR और SIR में क्या अंतर है*❓
SSR में मौजूदा मतदाता सूची को आधार बनाकर नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़े जाते हैं, विवरण सुधारे जाते हैं और गलत प्रविष्टियों की जांच होती है। इसके विपरीत, SIR में घर-घर जाकर गणना प्रपत्र भरवाने और मतदाताओं की प्रविष्टियों का अधिक गहन सत्यापन करने पर जोर दिया जाता है। दोनों प्रक्रियाओं का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध बनाना है, लेकिन उनकी प्रक्रिया और सत्यापन की व्यापकता अलग है।

*मतदाता क्या करें*❓ अपना नाम मतदाता सूची में जरूर जांचें। नाम नहीं होने पर फॉर्म-6, विवरण में सुधार के लिए फॉर्म-8 और किसी प्रविष्टि को हटाने के संबंध में आपत्ति के लिए फॉर्म-7 का उपयोग किया जा सकता है। BLO से सत्यापन के दौरान सही जानकारी दें और निर्धारित समय-सीमा का पालन करें। सूची में नाम नहीं मिलने पर समय रहते दावा प्रस्तुत करें।

मतदाता सूची की जांच के लिए *चुनाव आयोग के आधिकारिक पोर्टल* (https://voters.eci.gov.in/) का उपयोग करें या स्थानीय BLO से संपर्क करें।

_मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी प्रत्येक पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार सुरक्षित रखना है। इसलिए अंतिम तारीख का इंतजार न करें—अभी अपना नाम और विवरण जांचें ।_

@ *_रुक्मा पुत्र ऋषि_*

16/10/2026
16/10/2026

अमृत कलश

माँ महाकाली की दस महाविद्याएँ : अंतर्मन के अंधकार से आनंदमय जीवन की ओर

नीरजा फाउंडेशन, शुभम कॉलोनी, कायड़, अजमेर
सचिव श्रीमती सीमा पाराशर के हृदय-उद्गार

मेरी दृष्टि में माँ महाकाली की दस महाविद्याओं की पावन कथा केवल पुराणों का वर्णन नहीं, बल्कि अपने भीतर झाँकने, स्वयं को समझने और जीवन को नई दिशा देने की प्रेरणा है। मैं मानती हूँ कि सच्ची साधना केवल मंदिर में पूजा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने भीतर छिपे क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और कटुता को पहचानकर उनसे मुक्त होने में है। जब हम अपने मन के विकारों पर विजय प्राप्त करने लगते हैं, तभी हमारे जीवन में वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत होती है।

माँ काली का उग्र स्वरूप मुझे यह सोचने की प्रेरणा देता है कि हमें दूसरों से लड़ने से पहले अपने भीतर की बुराइयों से लड़ना सीखना चाहिए। पुराणों में वर्णित सती और दक्ष की कथा भी हमें समझाती है कि जब अहंकार संबंधों से बड़ा हो जाता है, तब प्रेम का स्थान संघर्ष ले लेता है। आज हमारे अनेक पारिवारिक रिश्ते भी छोटी-छोटी बातों, पुरानी गलतफहमियों और अपनी बात मनवाने की जिद के कारण कमजोर हो जाते हैं। मेरा मानना है कि जहाँ प्रेम, संवाद और समझ की संभावना हो, वहाँ हमें पहल करके रिश्तों को एक नया अवसर देना चाहिए।

दसों महाविद्याएँ हमें जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर विचार करने की प्रेरणा देती हैं। माँ तारा संकट में सहारा बनने, माँ छिन्नमस्ता स्वार्थ और अहंकार से ऊपर उठने, माँ षोडशी जीवन के सौंदर्य को पहचानने, माँ भुवनेश्वरी उदारता अपनाने, माँ त्रिपुरभैरवी कर्मठता, माँ धूमावती कठिन परिस्थितियों को स्वीकारने, माँ बगलामुखी वाणी पर संयम रखने, माँ मातंगी ज्ञान और विवेक तथा माँ कमला संतुलित समृद्धि का महत्त्व समझने की प्रेरणा देती हैं। इन स्वरूपों के प्रतीकात्मक संदेशों से मैं यही सीखती हूँ कि जीवन तभी सुंदर बनता है, जब हमारे विचारों में पवित्रता, व्यवहार में संवेदना और संबंधों में आत्मीयता हो।

वेदों, उपनिषदों, पुराणों और महाभारत की जीवन-दृष्टि से भी हमें आत्मचिंतन, विवेक, सदाचार और मानवीय मूल्यों की प्रेरणा मिलती है। मेरी समझ में पूजा का वास्तविक महत्त्व तभी है, जब उसका प्रभाव हमारे व्यवहार में दिखाई दे। यदि हम देवी के सामने सिर झुकाएँ, लेकिन अपने परिवार के सदस्यों का सम्मान न करें, यदि हम धर्म की बातें करें, लेकिन किसी दुखी व्यक्ति की सहायता के लिए आगे न आएँ, तो हमें अपनी साधना के वास्तविक उद्देश्य पर विचार अवश्य करना चाहिए।

मैं जीवन के एक ऐसे सत्य को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती हूँ, जिसे जानते हुए भी हम अक्सर भूल जाते हैं—हमारा जीवन सीमित है, इसलिए भविष्य सँवारने के प्रयास में वर्तमान को खो देना उचित नहीं है। हम सोचते रहते हैं कि जब अधिक धन होगा, तब आनंद लेंगे; जब सारी जिम्मेदारियाँ पूरी होंगी, तब परिवार के साथ समय बिताएँगे; और जब समस्याएँ समाप्त होंगी, तब निश्चिंत होकर मुस्कुराएँगे। लेकिन जीवन प्रतीक्षा नहीं करता। समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहता है और उसके साथ हमारे जीवन के अनमोल क्षण भी बीतते जाते हैं।

इसलिए मेरा मानना है कि भविष्य के लिए मेहनत करना और बचत करना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक आज को आनंदपूर्वक जीना भी है। बच्चों के साथ हँसना, जीवनसाथी की बात सुनना, बुजुर्गों के अनुभवों का सम्मान करना, मित्रों से आत्मीयता बनाए रखना और पड़ोसियों के सुख-दुख में सहभागी बनना भी जीवन की वास्तविक संपत्ति है। हम अपने परिवार को केवल धन-संपत्ति देकर खुशहाल नहीं बना सकते; हमें उन्हें अपना समय, विश्वास, स्नेह और अपनापन भी देना होगा।

मैं चाहती हूँ कि हमारे घरों में ऐसा वातावरण बने, जहाँ बच्चे बिना भय के अपनी बात कह सकें, बुजुर्ग स्वयं को उपेक्षित न समझें, जीवनसाथी एक-दूसरे की भावनाओं को समझें और मतभेद होने पर भी सम्मान बना रहे। समाज में भी हम ऐसा ही वातावरण बनाएँ, जहाँ पड़ोसी एक-दूसरे के काम आएँ, जरूरतमंद को सहारा मिले और किसी की खुशी में शामिल होने के लिए मन में ईर्ष्या नहीं, बल्कि प्रसन्नता हो।

मेरी दृष्टि में पुराने गिले-शिकवों को ढोते रहना अपने वर्तमान की खुशियों को स्वयं कम करने जैसा है। जहाँ संभव हो, हमें क्षमा करना, अपनी गलती स्वीकार करना और नए सिरे से शुरुआत करना सीखना चाहिए। क्षमा का अर्थ अन्याय सहना नहीं, बल्कि अपने मन को कटुता से मुक्त करना है। जहाँ आत्मसम्मान की रक्षा आवश्यक हो, वहाँ विवेक से निर्णय लेना चाहिए; लेकिन जहाँ केवल अहंकार बीच में खड़ा हो, वहाँ प्रेम और संवाद को एक अवसर अवश्य देना चाहिए।

माँ महाकाली की आराधना करते हुए मैं स्वयं से भी यही प्रश्न करती हूँ कि क्या मेरे व्यवहार से किसी को प्रसन्नता मिलती है? क्या मेरी वाणी किसी दुखी मन को सहारा देती है? क्या मैं अपने परिवार और समाज के लिए कुछ ऐसा कर पा रही हूँ, जिससे दूसरों का जीवन थोड़ा बेहतर बन सके? मेरा विश्वास है कि जब प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर ऐसे प्रश्नों के उत्तर खोजने लगेगा, तभी आध्यात्मिकता हमारे जीवन में वास्तविक रूप से फलित होगी।

मैं माँ महाकाली से यही प्रार्थना करती हूँ कि हमें अपने भीतर के अंधकार को पहचानने का विवेक, अपनी गलतियों को सुधारने का साहस, रिश्तों को सँवारने का धैर्य और वर्तमान को आनंदपूर्वक जीने की समझ प्रदान करें। हम भविष्य के लिए परिश्रम करें, लेकिन आज की खुशियों को न भूलें; अपने परिवार से प्रेम करें, लेकिन समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभाएँ; और जीवन में इतनी संवेदना बनाए रखें कि हमारे कारण किसी के चेहरे पर मुस्कान आ सके।

मेरे लिए माँ महाकाली की सच्ची आराधना यही है कि हम अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करें, अपने व्यवहार में प्रेम और करुणा लाएँ तथा अपने आसपास ऐसा वातावरण बनाएँ, जहाँ हर व्यक्ति को सम्मान, अपनापन और आनंद का अनुभव हो।

क्योंकि जीवन केवल साँसें लेते रहने का नाम नहीं, बल्कि उन साँसों के बीच प्रेम बाँटने, रिश्तों को सँवारने और दूसरों के जीवन में खुशियों के दीप जलाने का नाम है।

जय माँ महाकाली।

श्रीमती सीमा पाराशर
सचिव, नीरजा फाउंडेशन
शुभम कॉलोनी, कायड़, अजमेर

🌺 विजयादशमी: परंपराओं में छिपा जीवन को श्रेष्ठ बनाने का संदेशनीलकंठ के दर्शन से लेकर बुजुर्गों के आशीर्वाद और सामाजिक एक...
15/10/2026

🌺 विजयादशमी: परंपराओं में छिपा जीवन को श्रेष्ठ बनाने का संदेश
नीलकंठ के दर्शन से लेकर बुजुर्गों के आशीर्वाद और सामाजिक एकता तक
— श्रीमती सीमा पाराशर, सचिव, नीरजा फाउंडेशन ट्रस्ट, अजमेर
दशहरा अर्थात विजयादशमी केवल रावण पर श्रीराम की विजय का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और स्वार्थ पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा भी है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में वास्तविक विजय केवल दूसरों को पराजित करने में नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाने, रिश्तों को सँभालने और समाज में प्रेम एवं सद्भाव बनाए रखने में है। हमारी सनातन संस्कृति में प्रत्येक पर्व के पीछे कोई न कोई ऐसा जीवन-दर्शन छिपा है, जो मनुष्य को प्रकृति, परिवार और समाज से जोड़ता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम परंपराओं को निभाने के साथ-साथ उनके वास्तविक अर्थ को भी समझें।
विजयादशमी पर नीलकंठ पक्षी के दर्शन की लोक-परंपरा इसका एक सुंदर उदाहरण है। भगवान शिव को समुद्र मंथन से निकले कालकूट विष को धारण करने के कारण नीलकंठ कहा जाता है। इस प्रसंग में एक गहरा संदेश छिपा है—दूसरों की रक्षा के लिए कठिनाइयों को सहना, विषम परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना और अपने सामर्थ्य से संसार का कल्याण करना। नीलकंठ पक्षी के दर्शन को शुभ मानने की परंपरा भी हमारी सांस्कृतिक आस्था का हिस्सा है। लेकिन आज हमें इसके साथ एक और प्रश्न जोड़ना चाहिए: क्या हम अपने जीवन में उन लोगों का सम्मान करते हैं, जो स्वयं कठिनाइयाँ सहकर हमारे जीवन को सरल बनाने का प्रयास करते हैं?
हमारे माता-पिता, परिवार के बुजुर्ग और गुरुजन जीवन के ऐसे ही मार्गदर्शक हैं। वे अपने अनुभवों से अनेक कठिनाइयों का सामना कर चुके होते हैं। उनकी सलाह में कभी-कभी हमें पुरानी सोच दिखाई दे सकती है, लेकिन उनके अनुभवों में जीवन की ऐसी सीख छिपी होती है, जो केवल पुस्तकों या मोबाइल की स्क्रीन से नहीं मिल सकती। जिस प्रकार नीलकंठ के दर्शन को शुभ शकुन माना जाता है, उसी प्रकार अपने बुजुर्गों के अनुभव सुनना, उनके प्रति सम्मान रखना और उनके आशीर्वाद को महत्त्व देना भी जीवन को सही दिशा देने वाला व्यवहार है। डिजिटल माध्यम से शुभकामनाएँ भेजना गलत नहीं, लेकिन यदि हम अपने ही घर के बुजुर्गों के पास बैठने, उनका हाल पूछने और उनकी बात सुनने का समय नहीं निकालते, तो हमें अपने जीवन की प्राथमिकताओं पर विचार अवश्य करना चाहिए।
आज मनुष्य तकनीकी रूप से जितना जुड़ता जा रहा है, भावनात्मक रूप से उतना ही अकेला पड़ता दिखाई देता है। मोबाइल पर सैकड़ों संपर्क हैं, लेकिन सुख-दुःख बाँटने के लिए अपने पास बैठने वाला व्यक्ति कम होता जा रहा है। त्योहारों पर संदेशों की भरमार है, लेकिन प्रत्यक्ष मुलाकातों और आत्मीय संवादों में कमी आती जा रही है। ऐसे समय में विजयादशमी हमें अपनी जीवनशैली पर आत्ममंथन करने का अवसर देती है। क्या हमारी प्रगति केवल अच्छी नौकरी, अधिक कमाई और आधुनिक सुविधाओं तक सीमित रह गई है, या हम अपने परिवार और समाज को भी उतना ही समृद्ध बना रहे हैं?
हमारी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था की एक बड़ी विशेषता सामूहिकता थी। किसी घर में भजन, पूजन, विवाह या अन्य उत्सव होता था, तो उसमें पड़ोसियों और रिश्तेदारों की भी भागीदारी रहती थी। घरों से पकवान आते, लोग एक साथ बैठकर भोजन करते और एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनते थे। इन आयोजनों का महत्त्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं था; वे आपसी विश्वास, सहयोग और अपनत्व को मजबूत करने का माध्यम भी थे। आज व्यस्त जीवन में हर परिवार का अपना कार्यक्रम और अपनी दिनचर्या है, लेकिन यदि हम त्योहारों के अवसर पर पड़ोसियों, मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने का समय निकालें, किसी जरूरतमंद परिवार को साथ जोड़ें और सामूहिक रूप से खुशियाँ बाँटें, तो सामाजिक जीवन में फिर से आत्मीयता लौट सकती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि पुराने समय की प्रत्येक परंपरा को बिना विचार किए अपनाया जाए। समय के साथ जीवन की परिस्थितियाँ बदलती हैं। संयुक्त परिवारों की जगह अनेक स्थानों पर छोटे परिवारों ने ले ली है और रोजगार के कारण लोग अपने घरों से दूर रहते हैं। फिर भी परिवार और समाज से जुड़े रहने के लिए भौगोलिक निकटता से अधिक आवश्यक है—भावनात्मक निकटता, संवाद और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी। यदि हम दूर रहकर भी नियमित रूप से माता-पिता का हाल पूछें, बच्चों के साथ समय बिताएँ, बुजुर्गों की आवश्यकताओं का ध्यान रखें और जरूरत पड़ने पर पड़ोसियों की सहायता करें, तो आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच भी पुरानी संस्कृति की आत्मा को जीवित रख सकते हैं।
विजयादशमी का एक और महत्त्वपूर्ण संदेश है—अपने भीतर के रावण को पहचानना। रावण के दस सिरों को हम प्रतीकात्मक रूप से अपने उन दोषों से जोड़कर देख सकते हैं, जो जीवन में अशांति पैदा करते हैं। अहंकार हमें दूसरों से दूर करता है, क्रोध संबंधों को कमजोर करता है, लोभ संतोष छीनता है और स्वार्थ हमें दूसरों के दुःख से विमुख कर देता है। यदि हम हर वर्ष रावण दहन देखने के बाद अपने व्यवहार में एक दोष कम करने का संकल्प लें, तो त्योहार का संदेश हमारे जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला सकता है। दूसरों की गलतियाँ गिनाने से पहले अपनी कमियों को पहचानना ही आत्मविजय की पहली सीढ़ी है।
प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी इसी जीवन-दर्शन का हिस्सा है। नीलकंठ पक्षी का सम्मान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहना चाहिए; हमें उसके प्राकृतिक आवास और अन्य जीव-जंतुओं की रक्षा का प्रयास भी करना चाहिए। त्योहार के नाम पर किसी पक्षी को पकड़ना, उसे परेशान करना या उसके प्राकृतिक जीवन में बाधा डालना उचित नहीं है। सच्ची श्रद्धा वही है, जो प्रकृति और जीवों के प्रति करुणा उत्पन्न करे। यदि हम विजयादशमी पर प्रकृति की रक्षा, स्वच्छता और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का संकल्प लें, तो हमारी परंपरा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उपयोगी बनेगी।
विजयादशमी का वास्तविक उत्सव तब पूर्ण होगा, जब हम केवल शुभ शकुन की प्रतीक्षा न करें, बल्कि स्वयं दूसरों के जीवन में शुभता का कारण बनें। बुजुर्गों का सम्मान करें, बच्चों को संस्कारों के साथ स्वतंत्र विचार की शिक्षा दें, परिवार में संवाद बनाए रखें, मित्रों और पड़ोसियों के साथ आत्मीयता रखें तथा समाज के कमजोर वर्गों की सहायता के लिए आगे आएँ। धन और सफलता अर्जित करना आवश्यक है, लेकिन उनका वास्तविक मूल्य तभी है, जब उनसे परिवार को सुरक्षा, समाज को सहयोग और जीवन को संतोष मिले।
आइए, इस विजयादशमी पर हम संकल्प लें कि हम अपनी परंपराओं को केवल औपचारिकता नहीं बनने देंगे। उनके पीछे छिपे मानवीय मूल्यों को अपने आचरण में उतारेंगे। नीलकंठ के दर्शन की शुभता को बुजुर्गों के अनुभव और आशीर्वाद से जोड़ेंगे, त्योहारों की खुशियों को सामाजिक सहभागिता से बढ़ाएँगे और श्रीराम की विजय से प्रेरणा लेकर अपने भीतर के अहंकार, स्वार्थ और कटुता पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करेंगे।
क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी विजय वह नहीं, जो संसार को दिखाई दे; सबसे बड़ी विजय वह है, जिससे हमारा परिवार सुखी हो, हमारे संबंध मजबूत हों, हमारा समाज संवेदनशील बने और हमारे कारण किसी दूसरे के जीवन में आशा का दीप जले।
🌺 आप सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। धर्म, सत्य, सद्भाव और मानवीय संवेदना की विजय ही हमारे जीवन की सच्ची विजय बने।
श्रीमती सीमा पाराशर
सचिव — नीरजा फाउंडेशन ट्रस्ट
शुभम कॉलोनी, कायड़, अजमेर

14/10/2026
🌺 अमृत कथा — पारस की परखधन कमाने वाला नहीं, जीवन को सार्थक बनाने वाला बनें।एक नगर में भीमा नाम का एक वृद्ध लोहार रहता था...
13/10/2026

🌺 अमृत कथा — पारस की परख
धन कमाने वाला नहीं, जीवन को सार्थक बनाने वाला बनें।
एक नगर में भीमा नाम का एक वृद्ध लोहार रहता था। वह दिनभर भट्टी में लोहा तपाता और हथौड़े से औजार बनाता था। आर्थिक रूप से साधारण होने के बावजूद उसके मन में संतोष था। काम करते समय उसके मुख से सदैव ‘हरे कृष्ण’ का नाम निकलता था। वह अपनी मेहनत और ईमानदारी को ही भगवान की सेवा मानता था।
एक दिन एक सिद्ध साधु उसकी निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर उसे पारस पत्थर देते हुए बोले, “भीमा! यह पत्थर लोहे को सोना बना सकता है। इसे अपने पास रख लो, तुम्हारी गरीबी दूर हो जाएगी और तुम्हें जीवनभर इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।”
भीमा ने पत्थर संभालकर रख लिया, लेकिन अपना काम पहले की तरह करता रहा। तीन वर्ष बाद साधु लौटे तो उन्होंने देखा कि भीमा आज भी उसी भट्टी के सामने मेहनत कर रहा है। आश्चर्य से पूछा, “भीमा! तुमने इस पारस पत्थर का उपयोग क्यों नहीं किया? इससे तो तुम बहुत धनवान बन सकते थे!”
भीमा ने पत्थर लौटाते हुए विनम्रता से कहा, “महाराज! यह पारस लोहे को सोना बना सकता है, लेकिन मेरे ठाकुर जी ने मुझे नाम, कर्म और सदाचार का ऐसा पारस दिया है, जो मेरे मन को निर्मल बनाने की प्रेरणा देता है। मैं मेहनत करके ईमानदारी से कमाता हूँ, अपने परिवार का पालन करता हूँ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूसरों के काम आता हूँ। मेरे लिए धन कमाना आवश्यक है, लेकिन धन के लिए अपने कर्तव्य, संबंध और मन की शांति खो देना उचित नहीं। मैं चाहता हूँ कि जीवन के अंत में मेरे पास धन कितना था, इससे अधिक महत्त्व इस बात का हो कि मैंने अपना जीवन कैसे जिया और मेरे व्यवहार से कितने लोगों को सुख मिला।”
साधु समझ गए कि भीमा ने जीवन की वास्तविक संपत्ति पहचान ली है। संसार का पारस लोहे को सोना बना सकता है, लेकिन मनुष्य को श्रेष्ठ बनाने के लिए उसे अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों को भी निखारना पड़ता है।
🌿 आज के मनुष्य के लिए आत्ममंथन
आज का मनुष्य भी अपने जीवन में पारस की तलाश कर रहा है। कोई अधिक कमाई के पीछे दौड़ रहा है, कोई बड़े पद और प्रतिष्ठा के लिए दिन-रात परिश्रम कर रहा है। परिवार को सुख-सुविधाएँ देना, बच्चों का भविष्य बनाना और आर्थिक रूप से मजबूत होना निश्चित रूप से आवश्यक है। लेकिन प्रश्न यह है कि जिस धन को कमाने के लिए हम जीवन का अधिकांश समय लगा रहे हैं, क्या उसी जीवन को जीने, रिश्तों को सँभालने और अपनों के साथ सुख बाँटने के लिए भी पर्याप्त समय दे रहे हैं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि धन कमाने की दौड़ में हम माता-पिता के साथ बैठकर बात करना भूल रहे हैं, बच्चों के बचपन को समय नहीं दे पा रहे हैं, जीवनसाथी की भावनाओं को समझने का अवसर खो रहे हैं और मित्रों तथा संबंधियों के सुख-दुःख में सहभागी बनने से पीछे हट रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम भविष्य को बेहतर बनाने के प्रयास में वर्तमान को ही जीना भूल गए हैं?
धन कमाना जीवन की आवश्यकता है, लेकिन केवल धन कमाना ही जीवन का उद्देश्य नहीं है। धन से घर खरीदा जा सकता है, लेकिन घर में अपनापन नहीं; महँगे उपहार दिए जा सकते हैं, लेकिन सच्चा स्नेह नहीं; सुविधाएँ जुटाई जा सकती हैं, लेकिन किसी के दुःख में उसके पास बैठने से मिलने वाला संबल नहीं। रिश्ते समय, विश्वास, संवेदना और जिम्मेदारी से बनते हैं। यदि हम अपने प्रियजनों को केवल सुविधाएँ दें, लेकिन उन्हें अपना समय, सम्मान और भावनात्मक सहारा न दे पाएँ, तो जीवन की उपलब्धियों में कुछ महत्त्वपूर्ण कमी रह जाती है।
श्रीमद्भगवद्गीता का कर्मयोग हमें कर्तव्य निभाने की प्रेरणा देता है। इसका अर्थ यह भी है कि हम अपनी जिम्मेदारियों से भागें नहीं, बल्कि उन्हें संतुलित और ईमानदार भाव से निभाएँ। परिवार के प्रति दायित्व, समाज के प्रति संवेदना, जरूरतमंद की सहायता और अपने आचरण में सत्य बनाए रखना भी जीवन की सार्थकता के महत्त्वपूर्ण आधार हैं।
हमें ऐसा पारस बनना है, जो केवल अपनी कमाई न बढ़ाए, बल्कि अपने व्यवहार से रिश्तों में मिठास बढ़ाए; जो केवल अपने परिवार के लिए संपत्ति न जुटाए, बल्कि परिवार को समय और संस्कार भी दे; जो केवल अपनी सफलता पर प्रसन्न न हो, बल्कि दूसरों की सफलता में भी आनंद अनुभव करे। ऐसा व्यक्ति अपने जीवनकाल में भी लोगों के हृदय में स्थान बनाता है और उसके जाने के बाद भी उसके अच्छे कर्मों की स्मृतियाँ जीवित रहती हैं।
मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है। उस समय हम अपने साथ धन-संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा लेकर नहीं जाते। हमारे जीवन का मूल्यांकन अंततः इस आधार पर भी होता है कि हमने अपने दायित्व किस प्रकार निभाए, दूसरों के साथ कैसा व्यवहार किया और अपने पीछे कैसी स्मृतियाँ छोड़ीं। इसलिए जीवन रहते हुए ही ऐसा प्रयास करें कि हमारे अपने हमें केवल हमारी कमाई के लिए नहीं, बल्कि हमारे प्रेम, सहयोग, ईमानदारी और संवेदनशीलता के लिए याद करें।
🌺 नीरजा फाउंडेशन का प्रेरणा संदेश
आइए, हम सब अपने जीवन में एक संकल्प लें—धन अवश्य कमाएँ, लेकिन धन के लिए रिश्तों को न खोएँ; सफलता अवश्य प्राप्त करें, लेकिन सफलता के अहंकार में अपनों को न भूलें; अपने परिवार को सुख-सुविधाएँ दें, लेकिन उनके साथ बैठकर सुख बाँटना भी सीखें। अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाएँ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार समाज तथा जरूरतमंदों के लिए भी कुछ करें।
जीवन की सच्ची सफलता केवल यह नहीं कि हमने कितना धन कमाया, बल्कि यह भी है कि हमने अपने जीवन में कितना प्रेम बाँटा, कितने दायित्व निभाए और कितने हृदयों में अपने लिए सम्मान और अपनापन छोड़ा।
याद रखिए, लोहे को सोना बनाने वाला पारस संसार को धनवान बना सकता है, लेकिन विचारों, संस्कारों और सद्कर्मों का पारस ही जीवन को वास्तव में मूल्यवान बनाता है।
🙏 ईश्वर हमें ऐसी बुद्धि और संवेदना प्रदान करें कि हम जीवन की यात्रा में धन भी अर्जित करें, रिश्तों को भी सँभालें, अपने कर्तव्यों का भी निर्वहन करें और संसार से विदा होते समय अपने पीछे प्रेम, सद्भाव तथा अच्छे कर्मों की अमूल्य विरासत छोड़कर जाएँ।
सादर — नीरजा फाउंडेशन
शुभम कॉलोनी, कायड़, अजमेर
सचिव — श्रीमती सीमा पाराशर

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