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महान लेखक टालस्टाय की एक कहानी है - "शर्त "इस कहानी में दो मित्रो में आपस मे शर्त लगती है कि, यदि उसने 1 माह एकांत में ब...
30/03/2020

महान लेखक टालस्टाय की एक कहानी है - "शर्त "

इस कहानी में दो मित्रो में आपस मे शर्त लगती है कि, यदि उसने 1 माह एकांत में बिना किसी से मिले,बातचीत किये एक कमरे में बिता देता है, तो उसे 10 लाख नकद वो देगा । इस बीच, यदि वो शर्त पूरी नहीं करता, तो वो हार जाएगा ।
पहला मित्र ये शर्त स्वीकार कर लेता है । उसे दूर एक खाली मकान में बंद करके रख दिया जाता है । बस दो जून का भोजन और कुछ किताबें उसे दी गई ।

उसने जब वहां अकेले रहना शुरू किया तो 1 दिन 2 दिन किताबो से मन बहल गया फिर वो खीझने लगा । उसे बताया गया था कि थोड़ा भी बर्दाश्त से बाहर हो तो वो घण्टी बजा के संकेत दे सकता है और उसे वहां से निकाल लिया जाएगा ।
जैसे-जैसे दिन बीतने लगे उसे एक-एक घण्टे युगों से लगने लगे । वो चीखता, चिल्लाता लेकिन शर्त का खयाल कर बाहर किसी को नहीं बुलाता । वोअपने बाल नोचता, रोता, गालियां देता तड़फ जाता, मतलब अकेलेपन की पीड़ा उसे भयानक लगने लगी पर वो शर्त की याद कर अपने को रोक लेता ।

कुछ दिन और बीते तो धीरे-धीरे उसके भीतर एक अजीब शांति घटित होने लगी। अब उसे किसी की आवश्यकता का अनुभव नहीं होने लगा। वो बस मौन बैठा रहता। एकदम शांत | उसका चीखना चिल्लाना बंद हो गया।

इधर, उसके दोस्त को चिंता होने लगी कि एक माह के दिन पर दिन बीत रहे हैं पर उसका दोस्त है कि बाहर ही नहीं आ रहा है ।
माह के अब अंतिम 2 दिन शेष थे, इधर उस दोस्त का व्यापार चौपट हो गया वो दिवालिया हो गया। उसे अब चिंता होने लगी कि यदि उसके मित्र ने शर्त जीत ली तो इतने पैसे वो उसे कहाँ से देगा ।
वो उसे गोली मारने की योजना बनाता है और उसे मारने के लिये जाता है ।

जब वो वहां पहुँचता है तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता ।
वो दोस्त शर्त के एक माह के ठीक एक दिन पहले वहां से चला जाता है और एक खत अपने दोस्त के नाम छोड़ जाता है ।
खत में लिखा होता है-
प्यारे दोस्त इन एक महीनों में मैंने वो चीज पा ली है जिसका कोई मोल नही चुका सकता । मैंने अकेले मे रहकर असीम शांति का सुख पा लिया है और मैं ये भी जान चुका हूं कि जितनी जरूरतें हमारी कम होती जाती हैं उतना हमें असीम आनंद और शांति मिलती है, मैंने इन दिनों परमात्मा के असीम प्यार को जान लिया है । इसीलिए मैं अपनी ओर से यह शर्त तोड़ रहा हूँ, अब मुझे तुम्हारे शर्त के पैसे की कोई जरूरत नहीं ।

साथियों इस मुश्किल की घड़ी में, अगर आपको आस पास कोई भूखा, लाचार, असहाय दिखाई दे तो उसकी यथासंभव सहायता अवश्य करें।कहीं ऐ...
26/03/2020

साथियों इस मुश्किल की घड़ी में, अगर आपको आस पास कोई भूखा, लाचार, असहाय दिखाई दे तो उसकी यथासंभव सहायता अवश्य करें।

कहीं ऐसा न हो कि कोरोनावायरस तो हार जाए लेकिन किसी असहाय से भूख जीत जाए।

महाभारत का युद्ध अपने चरम पर था - एक से एकबड़े योद्धा एक दूसरे से घनघोर युद्ध कर रहे थे।कभी कौरवो का पक्ष भारी तो कभी पा...
07/06/2014

महाभारत का युद्ध अपने चरम पर था - एक से एक
बड़े योद्धा एक दूसरे से घनघोर युद्ध कर रहे थे।
कभी कौरवो का पक्ष भारी तो कभी पांडवो का - गुरु
द्रोणाचार्य और उनके शिष्य अर्जुन आमने-सामने थे।
अर्जुन अपनी पूरी क्षमता और कौशल के साथ अपने
गुरु पर आघात कर रहे थे। द्रोणाचार्य लड़खड़ा रहे थे
- उनका सारा कौशल और ज्ञान अपने ही शिष्य के
आगे निरर्थक प्रतीत हो रहा था। अर्जुन पूरे उत्साह
के साथ आगे बढ़ते जा रहा थे - यह दृश्य
सबको अचंभित रहा था। अर्जुन का इस तरह आगे
बढ़ना पांडवों में नई स्फूर्ति का संचार कर
रहा था दूसरी ओर कौरवों के हौसले पस्त हो रहे थे।
तभी कौरवों में से एक ने दूसरे से प्रश्न किया - यह
क्या हो रहा है ? अर्जुन ने जिस व्यक्ति से सब कुछ
सीखा वह उसे वह मात दे रहा है। शास्त्रो के
ज्ञाता गुरु की हालत लगातार खराब होती जा रही है,
यह कैसे संभव है ? इस आश्चर्य का क्या रहस्य है
कि गुरु हारता और शिष्य जीतता जा रहा है ? यह
बात द्रोणाचार्य ने सुन ली। उन्होंने उसकी दुविधा दूर
करते हुए कहा - मुझे लंबा समय राजाश्रय की सुख-
सुविधाएं भोगते हुए हो गया जबकि अर्जुन निरंतर
कठिनाइयों से जूझता रहा है। एक सुविधा संपन्न
व्यक्ति अपना सामर्थ्य गंवा बैठता है और
संघर्षशील व्यक्ति की क्षमता निरंतर
बढ़ती जाती है। अनेक सिद्ध महापुरुषों का जीवन इस
बात का साक्षी है कि सफलता का "कमल"
कठिनाइयों के कीचड़ के बीच खिलता है। तभी तक
जीवन धारदार रहता है जब तक वह प्रतिरोधों और
चुनौतियों की सान पर चढ़ा रहता है।
कठिनाइयां समाप्त होने पर व्यक्ति आलस्य
का शिकार हो जाता है - छोटे से भी विरोध और
व्यवधान का सामना करने में वह स्वयं को नितांत
असमर्थ पाता है। वह जीवन में कभी विजय
नहीं प्राप्त कर सकता। द्रोणाचार्य की यह बात
कौरवों को अच्छी नहीं लगी पर अंतत: यह सत्य
सिद्ध हुई . . . . . . मित्रो संघर्ष से ही जीवन
का वास्तविक मूल्य पता चलता है . .

BS GILL .
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एक बुजुर्ग ग्रामीण के पास एक बहुत ही सुंदर और शक्तिशाली घोड़ा था. वह उससे बहुत प्यार करता था. उस घोड़े को खरीदने के कई आ...
07/05/2014

एक बुजुर्ग ग्रामीण के पास एक बहुत ही सुंदर और शक्तिशाली घोड़ा था. वह उससे बहुत प्यार करता था. उस घोड़े को खरीदने के कई आकर्षक प्रस्ताव उसके पास आए, मगर उसने उसे नहीं बेचा. एक रात उसका घोड़ा अस्तबल से गायब हो गया.
गांव वालों में से किसी ने कहा
“अच्छा होता कि तुम इसे किसी को बेच देते. कई तो बड़ी कीमत दे रहे थे. बड़ा नुकसान हो गया.”
परंतु उस बुजुर्ग ने यह बात ठहाके में उड़ा दी और कहा – “आप सब बकवास कर रहे हैं. मेरे लिए तो मेरा घोड़ा बस अस्तबल में नहीं है. ईश्वर इच्छा में जो होगा आगे देखा जाएगा.”
कुछ दिन बाद उसका घोड़ा अस्तबल में वापस आ गया. वो अपने साथ कई जंगली घोड़े व घोड़ियाँ ले आया था.
ग्रामीणों ने उसे बधाईयाँ दी और कहा कि उसका तो भाग्य चमक गया है.
परंतु उस बुजुर्ग ने फिर से यह बात ठहाके में उड़ा दी और कहा – “बकवास! मेरे लिए तो बस आज मेरा घोड़ा वापस आया है. कल क्या होगा किसने देखा है.”
अगले दिन उस बुजुर्ग का बेटा एक जंगली घोड़े की सवारी करते गिर पड़ा और उसकी टाँग टूट गई. लोगों ने बुजुर्ग से सहानुभूति दर्शाई और कहा कि इससे तो बेहतर होता कि घोड़ा वापस ही नहीं आता. न वो वापस आता और न ही ये दुर्घटना घटती.
बुजुर्ग ने कहा – “किसी को इसका निष्कर्ष निकालने की जरूरत नहीं है. मेरे पुत्र के साथ एक हादसा हुआ है, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है, बस”
कुछ दिनों के बाद राजा के सिपाही गांव आए, और गांव के तमाम जवान आदमियों को अपने साथ लेकर चले गए. राजा को पड़ोसी देश में युद्ध करना था, और इसलिए नए सिपाहियों की भरती जरूरी थी. उस बुजुर्ग का बेटा चूंकि घायल था और युद्ध में किसी काम का नहीं था, अतः उसे नहीं ले जाया गया.
गांव के बचे बुजुर्गों ने उस बुजुर्ग से कहा – “हमने तो हमारे पुत्रों को खो दिया. दुश्मन तो ताकतवर है. युद्ध में हार निश्चित है. तुम भाग्यशाली हो, कम से कम तुम्हारा पुत्र तुम्हारे साथ तो है.”
उस बुजुर्ग ने कहा – "अभिशाप या आशीर्वाद के बीच बस आपकी निगाह का फ़र्क होता है. इसीलिए किसी भी चीज को वैसी निगाहों से न देखें. निस्पृह भाव से यदि चीजों को होने देंगे तो दुनिया खूबसूरत लगेगी...

BS GILL .
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एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया. उसने देखा कि हाथियों के अगल...
15/03/2014

एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया. उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ की हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं!!! ये स्पष्ठ था कि हाथी जब चाहते तब अपने बंधन तोड़ कर कहीं भी जा सकते थे, पर किसी वजह से वो ऐसा नहीं कर रहे थे.
उसने पास खड़े महावत से पूछा कि भला ये हाथी किस प्रकार इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास नही कर रहे हैं ?
तब महावत ने कहा, ” इन हाथियों को छोटे पर से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता है, उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती की इस बंधन को तोड़ सकें. बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों को नहीं तोड़ सकते,और बड़े होने पर भी उनका ये यकीन बना रहता है, इसलिए वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते.”
आदमी आश्चर्य में पड़ गया कि ये ताकतवर जानवर सिर्फ इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि वो इस बात में यकीन करते हैं!!
इन हाथियों की तरह ही हममें से कितने लोग सिर्फ पहले मिली असफलता के कारण ये मान बैठते हैं कि अब हमसे ये काम हो ही नहीं सकता और अपनी ही बनायीं हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े-जकड़े पूरा जीवन गुजार देते हैं.
याद रखिये असफलता जीवन का एक हिस्सा है ,और निरंतर प्रयास करने से ही सफलता मिलती है. यदि आप भी ऐसे किसी बंधन में बंधें हैं जो आपको अपने सपने सच करने से रोक रहा है तो उसे तोड़ डालिए….. आप हाथी नहीं इंसान हैं.

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BS GILL........

साधु की सीख---------)(->किसी गाँव मे एक साधु रहा करता था ,वो जब भी नाचता तो बारिस होती थी . अतः गाव के लोगों को जब भी बा...
11/03/2014

साधु की सीख---------)(->

किसी गाँव मे एक साधु रहा करता था ,वो जब भी नाचता तो बारिस होती थी . अतः गाव के लोगों को जब भी बारिस की जरूरत होती थी ,तो वे लोग साधु के पास जाते और उनसे अनुरोध करते की वे नाचे , और जब वो नाचने लगता तो बारिस ज़रूर होती.

कुछ दिनों बाद चार लड़के शहर से गाँव में घूमने आये, जब उन्हें यह बात मालूम हुई की किसी साधू के नाचने से बारिस होती है तो उन्हें यकीन नहीं हुआ .

शहरी पढाई लिखाई के घमंड में उन्होंने गाँव वालों को चुनौती दे दी कि हम भी नाचेंगे तो बारिस होगी और अगर हमारे नाचने से नहीं हुई तो उस साधु के नाचने से भी नहीं होगी.फिर क्या था अगले दिन सुबह-सुबह ही गाँव वाले उन लड़कों को लेकर साधु की कुटिया पर पहुंचे.

साधु को सारी बात बताई गयी , फिर लड़कों ने नाचना शुरू किया , आधे घंटे बीते और पहला लड़का थक कर बैठ गया पर बादल नहीं दिखे , कुछ देर में दूसरे ने भी यही किया और एक घंटा बीतते-बीतते बाकी दोनों लड़के भी थक कर बैठ गए, पर बारिश नहीं हुई.

अब साधु की बारी थी , उसने नाचना शुरू किया, एक घंटा बीता, बारिश नहीं हुई, साधु नाचता रहा …दो घंटा बीता बारिश नहीं हुई….पर साधु तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था ,धीरे-धीरे शाम ढलने लगी कि तभी बादलों की गड़गडाहत सुनाई दी और ज़ोरों की बारिश होने लगी . लड़के दंग रह गए
और तुरंत साधु से क्षमा मांगी और पूछा-

” बाबा भला ऐसा क्यों हुआ कि हमारे नाचने से बारिस नहीं हुई और आपके नाचने से हो गयी ?”

साधु ने उत्तर दिया – ” जब मैं नाचता हूँ तो दो बातों का ध्यान रखता हूँ , पहली बात मैं ये सोचता हूँ कि अगर मैं नाचूँगा तो बारिस को होना ही पड़ेगा और दूसरी ये कि मैं तब तक नाचूँगा जब तक कि बारिस न हो जाये .”

***Friends सफलता पाने वालों में यही गुण विद्यमान होता है वो जिस चीज को करते हैं उसमे उन्हें सफल होने का पूरा यकीन होता है और वे तब तक उस चीज को करते हैं जब तक कि उसमे सफल ना हो जाएं. इसलिए यदि हमें सफलता हांसिल करनी है तो उस साधु की तरह ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करना होगा !!!!!!!

BS GILL..........

** मेरे नाम का गुब्बारा ! ***एक बार पचास लोगों का ग्रुप किसी सेमीनार में हिस्सा ले रहा था। सेमीनार शुरू हुए अभी कुछ ही म...
05/03/2014

** मेरे नाम का गुब्बारा ! ***

एक बार पचास लोगों का ग्रुप किसी सेमीनार में हिस्सा ले रहा था। सेमीनार शुरू हुए अभी कुछ ही मिनट बीते थे कि स्पीकर अचानक ही रुका और सभी पार्टिसिपेंट्स को गुब्बारे देते हुए बोला , ” आप सभी को गुब्बारे पर इस मार्कर से अपना नाम लिखना है। ” सभी ने ऐसा ही किया। अब गुब्बारों को एक दुसरे कमरे में रख दिया गया। स्पीकर ने अब सभी को एक साथ कमरे में जाकर पांच मिनट के अंदर अपना नाम वाला गुब्बारा ढूंढने के लिए कहा। सारे पार्टिसिपेंट्स तेजी से रूम में घुसे और पागलों की तरह अपना नाम वाला गुब्बारा ढूंढने लगे। इस अफरा-तफरी में किसी को भी अपने नाम वाला गुब्बारा नहीं मिल पा रहा था… पांच मिनट बाद सभी को बाहर बुला लिया गया।
स्पीकर बोला , ” अरे! क्या हुआ , आप सभी खाली हाथ क्यों हैं ? क्या किसी को अपने नाम वाला गुब्बारा नहीं मिला ?”

एक पार्टिसिपेंट कुछ मायूस होते हुए बोला- ” नहीं ! हमने बहुत ढूंढा पर हमेशा किसी और के नाम का ही गुब्बारा हाथ आया…”,
स्पीकर ने निर्दश दिया- “कोई बात नहीं , आप लोग एक बार फिर कमरे में जाइये , पर इस बार जिसे जो भी गुब्बारा मिले उसे अपने हाथ में ले और उस व्यक्ति का नाम पुकारे जिसका नाम उस पर लिखा हुआ है। “,

एक बार फिर सभी पार्टिसिपेंट्स कमरे में गए, पर इस बार सब शांत थे , और कमरे में किसी तरह की अफरा-तफरी नहीं मची हुई थी। सभी ने एक दुसरे को उनके नाम के गुब्बारे दिए और तीन मिनट में ही बाहर निकले आये।
स्पीकर ने गम्भीर होते हुए कहा , ” बिलकुल यही चीज हमारे जीवन में भी हो रही है। हर कोई अपने लिए ही जी रहा है , उसे इससे कोई मतलब नहीं कि वह किस तरह औरों की मदद कर सकता है , वह तो बस पागलों की तरह अपनी ही खुशियां ढूंढ रहा है , पर बहुत ढूंढने के बाद भी उसे कुछ नहीं मिलता ,
दोस्तों हमारी ख़ुशी दूसरों की ख़ुशी में छिपी हुई है। जब आप औरों को उनकी खुशियां देना सीख जाओगे तो अपने-आप ही आपको अपनी खुशियां मिल जाएँगी और यही मानव-जीवन का उद्देश्य है।”

BS GILL.......

मन के घोड़े की लगाम को, अगर ठीला छोंड दो , तो वह गलत राह पर दौड़ने लगता है इसलिए ............~BS GILL~
03/03/2014

मन के घोड़े की लगाम को, अगर ठीला छोंड दो , तो वह गलत राह पर दौड़ने लगता है इसलिए ............

~BS GILL~

20/02/2014

एक बार एक बहेलिये ने जंगल में एक तीतर को पकड़ा । तीतर ने सोचा-यह पापी मेरी जान लेकर छोड़ेगा; परंतु अक्ल लगाकर जान बचाने की कोशिश तो करनी चाहिए।

उसने बहेलिये से पूछा, ‘‘तुम मेरा क्या करोगे ? मान लो कि बेचोगे, तो मुश्किल से मेरे बदले में चार-पाँच रुपए मिलेंगे। मारोगे तो सिर्फ पंख-ही-पंख हाथ लगेंगे। यदि पालोगे, तो भी एक-न-एक दिन मृत्यु हमारा वियोग करा ही देगी। लेकिन तुम मुझे छोड़ देने का वादा करो तो मैं तुम्हें तीन ऐसी नसीहतें दे सकता हूँ कि जिनमें प्रत्येक का मोल एक-एक लाख रुपए है।’’
बहेलिये ने कहा, ‘‘बतलाओ, मैं तुम्हें जरूर छोड़ दूँगा।’’
तीतर बोला-
‘‘पहली नसीहत सुन- बात कोई भी हजार सुनाए।
कीजिए वही, जो समझ में आए।।
दूसरी नसीहत- काबू हो तो कीजिए न गफलत।
संकट में हों तो हारिए न हिम्मत।।
तीसरी नसीहत- आता हो तो हाथ से न दीजिए।
जाता हो तो उसका गम न कीजिए।।’’

बहेलिये ने ज्यों ही ‘जाता हो तो गम न कीजिए’ सुना कि उस तीतर को छोड़ दिया।
तीतर तुरंत उड़कर पेड़ पर जा बैठा और बड़ी आजादी से बहेलिये से कहने लगा, ‘‘मैंने जो तीन नसीहतें तुझे बतलाई हैं, उनके उदाहरण भी दे देना चाहता हूँ। देख, मैं कैसी आफत में था, पर मैंने हिम्मत न हारी और अपनी बातों के बल पर तेरे चंगुल से छुटकारा पा लिया। तू गफलती और अभागा है कि बातों में आकर मेरे जैसे बहुमूल्य पक्षी को छोड़ दिया। मेरे पेटे में एक लाख कीमत का एक लाल है।’’

इस पर बहेलिया अफसोस कर हाथ मलने लगा। उसने तीतर को फिर पकड़ना चाहा। पर वह उड़कर पेड़ की ऊपरी टहनी पर जा बैठा और बोला, ‘‘मूर्ख, तू मेरी पहली नसीहत पर ध्यान देता तो मेरी बातों में न आता और दूसरी पर ध्यान देता तो मुझे छोड़ता ही नहीं। अब जरा अक्ल से काम ले कि तीतर के पेट में लाल कहाँ से आया ! मेरी बातों में आकर तूने मुझे छोड़ दिया और फिर मेरी ही बात से मुझे पकड़ने को खड़ा हो गया। अपनी अक्ल से काम लेना सीख। जो कोई कुछ कहेगा, उसी पर चलने लगेगा तो तेरा मनोरथ कभी सफल नहीं हो सकेगा ....
BS GILL.....

14/02/2014

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