09/10/2026
एक वक्त आता है 27 के आसपास, जब ज़िंदगी अचानक से हिट करती है।
बाइक की स्पीड ज़रा स्लो हो जाती है, हरी सब्ज़ियों को देखकर कदम रुक जाते हैं, देसी और अंग्रेज़ी खीरे का फर्क समझ में आने लगता है।
बच्चे “अंकल” कहने लगते हैं, और अगर आप किसी को “अंकल” या “आंटी” कह दें, तो वो भड़क जाता है।
फिर लगता है — साला इतना टाइम निकल गया, क्या उखाड़ा जीवन में!
ढंग के कपड़े नहीं हैं, अपनी एक कार तक नहीं है।
दोस्तों की शादी हो रही है।
है तो बस एक बेकार-सा कॉम्पिटिशन, जो पता नहीं कितने साल खाएगा।
पापा से पैसे माँगने में थोड़ा बुरा लगने लगता है,
पर पापा कहते हैं — “इतना बड़ा हो गया जी तुम, कि तुमको पैसा का चिंता होने लगा?”
घूमने भी एक-आध बार ही कहीं गए होंगे।
विदेश छोड़िए, हम तो पटना तक ढंग से नहीं घूमे हैं।
कुल मिलाकर बात यही है —
इसे अर्ली मिड-लाइफ़ क्राइसिस कहते हैं, जो लेट ट्वेंटीज़ और अर्ली थर्टीज़ में होता है।
ज़िंदगी रुकती नहीं,
जितना लुत्फ़ उठा सकते हैं — उठाइए। आप चाहे जिस उम्र पर हैं!!
- डॉ तन्मय कुंज
©